
यैर्दु:खानि समाप्नुवन्ति विधिवत्, जानन्ति पश्यन्ति नो;
वीर्यं नैव निजं भजन्त्यसुभृतो, नित्यं स्थिता: संसृतौ ।
कर्माणि प्रहतानि तानि महता, योगेन यैस्ते सदा;
सिद्धा नित्यचतुष्टयाऽमृतसरित्, नाथा भवेयुर्न किम् ॥7॥
जिनसे जीव विविध दु:ख सहते, निज को नहिं जानें-देखें ।
भ्रमण चतुर्गति करें निरन्तर, निज सामर्थ्य न प्राप्त करें॥
दुर्धर ज्ञान-योग के द्वारा, जिनने उनका नाश किया ।
नित्य अनन्त चतुष्टय अमृत-सागर सिद्ध नहीं हैं क्या ?
अन्वयार्थ : संसार में जिन कर्मों के निमित्त से संसारी जीव, नाना प्रकार के दु:खों को सहन करते हैं तथा वास्तविक रीति से पदार्थों के स्वरूप को न तो जानते हैं, न देखते हैं । जिन कर्मों की कृपा से जीव सामर्थ्य को भी प्राप्त नहीं करते हैं, उन कर्मों को जिन्होंने दुर्धर ध्यान के द्वारा जड़ से नष्ट कर दिया है - ऐसे वे सिद्ध भगवान, क्या अनन्त विज्ञान आदि अनन्त चतुष्टयरूपी अमृत नदी के स्वामी अर्थात् अनन्त चतुष्टय के धारी नहीं हैं ?