+ सभी जीवों में सिद्ध जीव, सबसे अधिक ज्ञानी और सुखी -
एकाऽक्षाद्बहुकर्मसंवृतमते:, द्वयक्षादिजीवा: सुख-;
ज्ञानाऽधिक्ययुता भवन्ति किमपि, कलेशोपशान्तेरिह ।
ये सिद्धास्तु समस्तकर्मविषम, ध्वान्तप्रबन्धच्युता:;
सद्बोधा: सुखिनश्च ते कथमहो, न स्युस्त्रिलोकाधिपा: ॥8॥
कर्मावरण-सहित एकेन्द्रिय-जीवों से त्रस-जीवों को ।
किञ्चित् सुख अरु ज्ञान अधिक है, कर्म-आवरणहीन कहो॥
तो जो सब कर्मों से विरहित, तीन लोक के स्वामी हों ।
ऐसे भगवन् सिद्ध प्रभु क्यों, परम ज्ञान-सुख-लीन न हों॥
अन्वयार्थ : बहुत कर्मों से छिपा हुआ है ज्ञान जिनका, ऐसे एकेन्द्रिय जीवों की अपेक्षा, जब कुछ दु:खों की शान्ति की अपेक्षा द्वीन्द्रिय आदि जीव अधिक सुखी तथा अधिक ज्ञानवान हैं तो जो समस्त कर्मरूपी भयंकर अन्धकार के सम्बन्ध से रहित हैं और जो तीन लोक के स्वामी हैं - ऐसे सिद्ध भगवान, सबसे अधिक श्रेष्ठ ज्ञान के धारी तथा अधिक सुखी क्यों न होंगे?