
य: केनाऽप्यऽतिगाढगाढमभितो, दु:खप्रदै: प्रग्रहै:;
बद्धोऽन्यैश्चनरो रुषा घनतरैराऽऽपादमाऽऽमस्तकम् ।
एकस्मिन् शिथिलेऽपि तत्र मनुते, सौख्यं स सिद्धा: पुन:;
किं न स्यु: सुखिन: सदा विरहिता, बाह्याऽन्तरैर्बन्धनै: ॥9॥
यदि किसी को कोई क्रोध से, अति दु:खदायी बन्धन से ।
मस्तक से पैरों तक चारों, ओर जोर से बाँध रखे॥
यदि एक भी रस्सी ढीली होवे तो वह सुख माने ।
बाह्याभ्यन्तर बन्ध रहित श्री सिद्ध प्रभु क्यों सुखी न हों॥
अन्वयार्थ : कोई मनुष्य, किसी मनुष्य को क्रोध से अत्यन्त दु:ख को देने वाले कठिन बन्धनों के द्वारा पैर से लेकर मस्तक पर्यन्त चारों ओर से बाँधे, उस बन्धन की यदि एक भी रस्सी ढीली हो जाए तो वह जीव, बँधा हुआ भी सुख मानता है; फिर जो समस्त बाह्य तथा अभ्यन्तर परिग्रह के बन्धन से रहित हैं - ऐसे सिद्ध भगवान क्यों नहीं सर्वोत्कृष्ट सुखी होंगे ?