
सर्वज्ञ: कुरुते परं तनुभृत:, प्राचुर्यत: कर्मणां;
रेणूनां गणनं किलाऽधिवसता,-मेकं प्रदेशं घनम् ।
इत्याशास्वखिलासु बद्धमहसो, दु:खं न कस्माद्भवेत्;
मुक्त्या यस्य तु सर्वत: किमिति नो, जायेत सौख्यं परम् ॥10॥
इक-इक प्रदेश में कर्मों के, इतने परमाणु सघन बसे ।
प्रभु सर्वज्ञ अलावा कोई, उनकी गणना कर न सके॥
उनसे जिनका तेज ढका वे, प्राणी क्यों न दु:खी होंगे ?
मुक्त सर्वथा कर्मों से, क्यों सिद्ध न परम सुखी होंगे ?
अन्वयार्थ : आत्मा के एक-एक प्रदेश में भी सघन रीति से व्याप्त इतने अधिक परमाणु हैं कि उनकी गिनती सर्वज्ञ को छोड़ कर, दूसरा कोई नहीं कर सकता - इस रीति से आत्मा के प्रत्येक प्रदेश पर अनन्त-अनन्त परमाणुओं के चिपटने के कारण जिस आत्मा का तेज चारों ओर से रुक गया है अर्थात् वह आत्मा न तो भलीभाँति पदार्थों को जान ही सकता है और न देख ही सकता है - ऐसे उस आत्मा को क्यों नहीं दु:ख होगा ? किन्तु जिसने समस्त कर्मों को जड़ से उड़ा दिया है अर्थात् जिसकी आत्मा के प्रदेशों में किसी भी प्रकार का कोई कर्मबन्ध नहीं है - ऐसे सिद्ध भगवान को अनन्तसुख क्यों नहीं होगा ?