+ सिद्धों के अनन्त तृप्त होने का कारण -
येषां कर्म-निदानजन्य-विविध, क्षुत्तृण्मुखा व्याधय:;
तेषामन्न-जलादिकौषध-गण:, तच्छान्तये युज्यते ।
सिद्धानां तु न कर्म तत्कृतरुजो, नाऽत: किमन्नादिभि:;
नित्यात्मोत्थसुखामृताम्बुधिगता:, तृप्तास्त एव धु्रवम् ॥11॥
कर्मों से उत्पन्न क्षुधादिक, व्याधि रहें जिन जीवों को ।
उनके शमन हेतु जल-अन्न आदि लेना पड़ते उनको॥
सिद्धों के नहिं कर्म अत:, उनको अन्नादिक से क्या काम ?
आत्मोत्पन्न सुखामृत-सागर, में निमग्न हो लें विश्राम॥
जिन संसारी जीवों में कर्म के उदय से उत्पन्न हुए क्षुधा-तृषा आदि रोग हैं,
अन्वयार्थ : उनको उन रोगों की शान्ति के लिए अन्न-जल आदि का आश्रय लेना पड़ता है; किन्तु सिद्ध भगवान के तो कर्म ही नहीं हैं तथा कर्मों के अभाव में उनको अन्न, जल आदि का आश्रय भी नहीं लेना पड़ता; इसलिए निश्चय से अविनाशी और आत्मा से ही उत्पन्न हुए सुखरूपी अमृत-समुद्र में मग्न सिद्ध ही अत्यन्त तृप्त हैं - ऐसा समझना चाहिए ।