+ योगीश्वर भी सिद्धों के समान -
सिद्ध-ज्योतिरतीव-निर्मल-तरं, ज्ञानैक-मूर्तिस्फुरत्;
वर्तिर्दीपमिवोपसेव्य लभते, योगी स्थिरं तत्पदम् ।
सद्-बुद्धयाऽथ विकल्प-जाल-रहित:, तद्रूपतामापतं;
तादृग्जायत एव देव-विनुत:, त्रैलोक्य-चूडामणि: ॥12॥
निर्मल ज्ञान ज्योतिमय मूर्ति-आराधन से योगीजन ।
ज्यों बाती दीपक हो जाती, वे भी होते सिद्ध स्वयं॥
भेद-ज्ञान से निर्विकल्प हो, प्राप्त करें योगी सिद्धत्व ।
सुर-वन्दित हो त्रिभुवन-चूड़ामणि हो जाते सिद्धों सम॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार बाती, स्फुरायमान दीपक के संग से दीपपने को प्राप्त हो जाती है; उसी प्रकार अत्यन्त निर्मल ज्ञानस्वरूप स्फुरायमान है मूर्ति जिसकी - ऐसी सिद्धज्योति की आराधना करने से मुनिगण भी उस स्थिर सिद्धपद को प्राप्त हो जाते हैं अथवा समस्त प्रकार के विकल्पों से रहित होकर जो योगीश्वर, श्रेष्ठ बुद्धि से उन सिद्धों के स्वरूप को प्राप्त होकर, उनके स्वरूप का ध्यान करते हैं; वे भी समस्त देवों में वन्दनीय तथा तीन लोक के चूड़ामणि अर्थात् सिद्धों के समान पूज्य हो जाते हैं ।