
यत्सूक्ष्मं च महच्च शून्यमपि यत्, नो शून्यमुत्पद्यते;
नश्यत्येव च नित्यमेव च तथा, नास्त्येव चास्त्येव यत् ।
एकं यद्यदनेकमेव तदपि, प्राप्तं प्रतीतिं दृढां;
सिद्धज्योतिरमूर्ति चित्सुखमयं, केनाऽपि तल्लभ्यते ॥13॥
जो है सूक्ष्म-महान और जो, शून्य-अशून्य तथा उत्पन्न ।
व्ययस्वरूप अरु नित्य-अनित्य, अस्ति-नास्ति से भी वर्णन॥
एक-अनेकस्वरूप वही है, तो भी जिसका दृढ़ श्रद्धान ।
चिदानन्दमय सिद्ध ज्योति को, पा सकता विरला महान॥
अन्वयार्थ : जो सिद्ध-ज्योति सूक्ष्म भी है और महान भी है, शून्य भी है और शून्य नहीं भी है, विनाशीक भी है और नित्य भी है, है भी और नहीं भी है तथा एक भी है और अनेक भी है - ऐसे अनेक धर्मों को लिये हुए है तथा स्याद्वाद से जिसकी प्रतीति दृढ़ है - ऐसी अमूर्तिक तथा ज्ञान-सुखस्वरूप सिद्धों की ज्योति को संसार में कोई विरला मनुष्य ही प्राप्त कर सकता है, सब नहीं ।