+ स्याद्वाद का ज्ञाता ही सिद्धों को जानने में समर्थ -
स्याच्छब्दाऽमृतगर्भिताऽऽगम-महा, रत्नाकर-स्नानतो;
धौता यस्य मति: स एव मनुते, तत्त्वं विमुक्ताऽऽत्मन: ।
तत्तस्यैव तदेव याति सुमते:, साक्षादुपादेयतां;
भेदेन स्वकृतेन तेन च विना, स्वं रूपमेकं परम् ॥14॥
स्याद्वाद अमृतमय आगम-रत्नाकर में कर स्नान ।
वह निर्मल मति ही कर सकता, सिद्ध-तत्त्व का सम्यग्ज्ञान॥
जब तक उसकी मति में होता, संसारी-सिद्धों का भेद ।
उपादेय हैं सिद्ध तभी तक, भेद बिना निजरूप अभेद॥
अन्वयार्थ : जिस पुरुष की बुद्धि, स्याद्वादरूपी जल से भरे हुए विस्तीर्ण सागर में स्नान करने से निर्मल हो गई है, धुल गई है अर्थात् जो स्याद्वाद का जानकार है; वही मनुष्य, सिद्धों के स्वरूप को जानता है तथा वही बुद्घिमान, उन सिद्धों के स्वरूप को साक्षात् रीति से प्राप्त होता है । अपने से किया हुआ जो भेद, उसके दूर हो जाने पर अपना जो स्वरूप है, वही सिद्धों का स्वरूप ज्ञात होता है । जब तक आत्मा में मेरा-तेरा भेद रहता है, तब तक आत्मा मलिन ही है, किन्तु जिस समय यह भेद-बुद्धि नष्ट हो जाती है, उस समय मलिनतारहित होने के कारण अपनी आत्मा का स्वरूप ही सिद्धस्वरूप प्रतिभासित होता है; इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे स्याद्वाद का स्वरूप भलीभाँति पहचान कर, सिद्धों के स्वरूप को पहचाने ।