+ मुमुक्षु जीव पर तत्त्वदृष्टि का प्रभाव -
दृष्टिस्तत्त्वविद: करोत्यविरतं, शुद्धात्मरूपे स्थिता;
शुद्धं तत्पदमेकमुल्बणमते,-रन्यत्र चाऽन्यादृशम् ।
स्वर्णात्तन्मयमेव वस्तु घटितं, लोहाच्च मुक्त्यर्थिना;
मुक्त्वा मोहविजृम्भितं ननु पथा, शुद्धेन संचर्यताम् ॥15॥
तत्वज्ञों की दृष्टि निरन्तर, आत्म-लीन शिवपद-दायी ।
अज्ञानी की दृष्टि लीन है, पर में भ्रमती चतुर्गति॥
स्वर्ण-विनिर्मित वस्तु स्वर्णमय, लौह विनिर्मित लौह-स्वरूप ।
अत: मुमुक्ष मोह-त्याग कर, गमन करें शिवमार्ग अनूप॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार सोने से बना हुआ पात्र सुवर्णस्वरूप ही होता है तथा लोहे से बना हुआ पात्र लौहस्वरूप ही होता है; उसी प्रकार शुद्ध आत्मस्वरूप में निश्चल रीति से ठहरी हुई तत्त्वज्ञानी पुरुष की दृष्टि, निर्मल दैदीप्यमान एक अविनाशी मोक्षपद प्राप्त कराती है और तत्त्वज्ञानरहित पुरुष की दृष्टि, शुद्धात्मस्वरूप से अतिरिक्त स्थान में ठहरने के कारण मोक्ष से भिन्न नरक, तिर्यंच आदि स्थानों को प्राप्त कराती है । इसलिए मोक्ष के अभिलाषी मनुष्यों को मोह उत्पन्न करने वाले मार्ग को छोड़ कर, निश्चय से शुद्ध मार्ग से ही गमन करना चाहिए ।