
निर्दाेषश्रुतचक्षुषा षडपि हि, द्रव्याणि दृष्ट्वा सुधी:;
आदत्ते विशदं स्वमन्यमिलितं, स्वर्णं यथा धावक: ।
य: कश्चित् किल निश्चिनोति रहित:, शास्त्रेण तत्त्वं परं;
सोऽन्धो रूपनिरूपणं हि कुरुते, प्राप्तो मन:शून्यताम् ॥16॥
निर्मल श्रुत-चक्षु से ज्ञानी, छह द्रव्यों में मिश्रितरूप ।
निज-स्वरूप को भिन्न देखते, स्वर्णकारवत् स्वर्णस्वरूप॥
यदि कोई आगम-चक्षु बिन, निज स्वरूप लखना चाहे ।
मूढ़ पुरुष वह मन अरु चक्षु, बिना रूप लखना चाहे॥
अन्वयार्थ : जिस प्रकार स्वर्णकार, अन्य धातुओं से मिले हुए सुवर्ण को भी नेत्रों से जुदा कर देख लेता है; उसी प्रकार विद्वान् पुरुष, निष्कलंक शास्त्ररूपी नेत्र से छह द्रव्यों को भलीभाँति देख कर, अन्य द्रव्यों से मिले हुए अपने निर्मल आत्म-स्वरूप को भी जुदा कर ग्रहण करते हैं; किन्तु जो मनुष्य, शास्त्र के बिना देखे ही उत्कृष्ट तत्त्व का निश्चय करते हैं, वे मन रहित अन्धे होकर रूप को देखना चाहते हैं - ऐसा मालूम होता है ।