+ हेय-उपादेय का ज्ञान ही सिद्धदशा की प्राप्ति का बीज -
यो हेयेतर-बोध-सम्भृत-मति:, मुञ्चन् स हेयं परं;
तत्त्वं स्वीकुरुते तदेव कथितं, सिद्धत्व-बीजं जिनै: ।
नान्यो भ्रान्तिगत: स्वतोऽथ परतो, हेये परेऽर्थेऽस्य तद्;
दुष्प्रापं शुचि वर्त्म येन परमं, तद्धाम सम्प्राप्यते ॥17॥
हेय-ग्राह्य के ज्ञानी त्याग, करें जब हेय पदार्थों का ।
उपादेय को ग्रहण करें यह, बीज कहें जिन शिवतरु का॥
हेय-ग्राह्य तत्त्वों में जिनको, स्व-पर हेतु से भ्रान्ति रहे ।
दुर्लभ निर्मल शिवपथ उनको, मोक्ष-धाम भी दुर्लभ है॥
अन्वयार्थ : जिस मनुष्य को 'यह वस्तु त्यागने योग्य है तथा यह वस्तु ग्रहण करने योग्य है' - इस प्रकार का ज्ञान है; वह मनुष्य, त्यागने योग्य वस्तु को छोड़ कर, ग्राह्य स्वरूप को ग्रहण करता है और वह ग्राह्य स्वरूप का स्वीकार ही सिद्धपने का कारण है - ऐसा श्री जिनेन्द्रदेव ने कहा है तथा जो मनुष्य, त्यागने योग्य अपने से भिन्न पदार्थों में अपने आप या पर के उपदेश से भ्रान्त (भ्रमसहित) होता है, उस अज्ञानी को अत्यन्त निर्मल मार्ग की प्राप्ति नहीं हो सकती; जब उसे निर्मल मार्ग की ही प्राप्ति नहीं हुई तो उत्कृष्ट मोक्ष स्थान की प्राप्ति कैसे हो सकती है ?