+ सिद्धत्व के अलावा अन्य प्रयोजन मिथ्या -
साऽङ्गोपाङ्गमपि श्रुतं बहुतरं, सिद्धत्व-निष्पत्तये;
येऽन्याऽर्थं परिकल्पयन्ति खलु ते, निर्वाण-मार्गच्युता: ।
मार्गं चिन्तयतोऽन्वयेन तमति,-क्रम्याऽपरेण स्फुटं;
नि:शेषं श्रुतमेति तत्र विपुले, साक्षाद्विचारे सति ॥18॥
अंगोपांग समस्त शास्त्र हैं, एकमात्र शिवपद के अर्थ ।
किन्तु प्रयोजन अन्य चाहते, जो हैं वे शिवपद से भ्रष्ट॥
परम्परा श्रुत-आलम्बन तज, करे मार्ग का जो सुविचार ।
प्राप्त करे स्पष्ट भावश्रुत, से वह सब शास्त्रों का सार॥
अन्वयार्थ : अङ्ग तथा उपाङ्ग सहित जितने भी शास्त्र हैं, वे सब सिद्धपने की प्राप्ति के लिए ही हैं; किन्तु जो अज्ञानी मनुष्य, उनको अन्य प्रयोजन के लिए कल्पना करते हैं, वे निश्चय से मोक्षमार्ग से भ्रष्ट हैं अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्ररूप मोक्षमार्ग का उनको अंशमात्र भी ज्ञान नहीं है क्योंकि विचारशील होने पर परम्परा से आये हुए द्रव्यश्रुत को छोड़ कर, यदि वह भावश्रुत से भी मार्ग का चिन्तवन करे तो भी उनके स्फुट रीति से समस्त शास्त्र की प्राप्ति होती है ।