+ सिद्ध-स्तुति, मोक्षरूपी महल के लिए सीढ़ी के समान -
नि:शेषश्रुतसम्पद: शमनिधे,-राराधनाया: फलं;
प्राप्तानां विषये सदैव सुखिना,-मल्पैव मुक्तात्मनाम् ।
उक्ता भक्तिवशान्मयाप्यविदुषा, या सापि गी: साम्प्रतं;
नि:श्रेणिर्भवतादऽनन्त-सुख-तद्धामाऽऽरुरुक्षोर्मम ॥19॥
जो अशेष श्रुतसम्पति शमनिधि, आराधन का फलअमलान ।
शाश्वत सुखमय सिद्धों की, स्तुति में जो कुछ यह गुणगान॥
भक्तिभाव से प्रेरित होकर, मुझ अज्ञानी द्वारा कथन ।
सुखमय मोक्षमहल के वाञ्छक, मेरे लिए नसैनी समान॥
अन्वयार्थ : जिन्होंने समस्त शास्त्ररूपी सम्पदा प्राप्त करके प्रशमवान होकर, आत्मतत्त्व की आराधना के फल को प्राप्त कर लिया है तथा जो सदाकाल सुखी हैं - ऐसे सिद्धों के विषय में मुझ अपण्डित ने भक्तिवश थोड़ी-सा कथन किया है अर्थात् जो कुछ भक्तिपूर्वक उनकी थोड़ी स्तुति की है; वह थोड़ी-सी वाणी (स्तुति), मुझे अनन्तसुखमय मोक्षरूपी महल पर चढ़ने की इच्छा करने वाले के लिए नि:श्रेणी (सीढ़ी) के समान है ।