
विश्वं पश्यति वेत्ति शर्म लभते, स्वोत्पन्नमात्यन्तिकं;
नाशोत्पत्तियुतं तथाऽप्यविचलं, मुक्त्यर्थिनां मानसे ।
एकीभूतमिदं वसत्यऽविरतं, संसार-भारोज्झितं;
शान्तं जीवघनं द्बितीयरहितं, मुक्तात्मरूपं मह: ॥20॥
जानें-देखे अखिल विश्व को, भोगे स्वाश्रित सौख्य अनन्त ।
नाशोत्पत्ति सहित अविचल है, ध्यावे उसे मुमुक्षु मन॥
एकरूप वह बसे निरन्तर, जो है जग के भार रहित ।
पर से भिन्न ज्ञानघन शान्त-स्वभावी है सिद्धों का तेज॥
अन्वयार्थ : सिद्धस्वरूप तेज, समस्त लोक को देखता-जानता है, सबसे अन्त में होने वाले अनन्त आत्मिक सुख को प्राप्त करता है और उत्पाद-व्यय-ध्रौव्यसहित है । मोक्षाभिलाषी मनुष्यों के मन में वह तेज, संसार-भारमय जन्म-मरणादि से रहित, शान्त, ज्ञानस्वरूप और अपने से भिन्न वस्तुओं के सम्बन्ध से रहित सदा एकरूप ही विराजमान है ।