
त्यक्त्वा न्यास-नय-प्रमाण-विवृती:, सर्वं पुन: कारकं;
सम्बन्धं च तथा त्वमित्यहमिति, प्रायान् विकल्पानपि ।
सर्वोपाधि-विवर्जितात्मनि परं, शुद्धैक-बोधात्मनि;
स्थित्वा सिद्धिमुपाश्रितो विजयते, सिद्ध: समृद्धो गुणै: ॥21॥
नय-प्रमाण-निक्षेप विकल्पों, कर्ता-कर्म भेद को छोड़ ।
'मैं' 'तू'आदि विकल्प तथा सब, कृत्रिम सम्बन्धों को छोड़॥
कर्मोंपाधि रहित होकर निज, ज्ञान-स्वभावी आतम में ।
लीन सदा जो गुण-समृद्ध, वे सिद्ध सदा जयवन्त रहें॥
अन्वयार्थ : जो सिद्ध भगवान, नाम-स्थापना आदि निक्षेपों को छोड़ कर, नैगम आदि नयों को त्याग कर, प्रत्यक्ष-परोक्ष प्रमाण के व्यापार को छोड़ कर, कर्ता-कर्म-करण आदि कारकों को छोड़ कर, समस्त सम्बन्ध को तथा 'तू' 'मैं' इत्यादि समस्त विकल्पों को भी छोड़ कर, समस्त प्रकार की कर्मादि उपाधियों से रहित होकर, शुद्ध और ज्ञानानन्दस्वरूप आत्मा में लीन होकर, मोक्ष को प्राप्त हुए हैं; वे समस्त विज्ञान आदि गुणों से वृद्धि को प्राप्त भगवान, इस लोक में सदैव विशेष रीति से जयवन्त हैं अर्थात् ऐसे सिद्ध भगवान को मैं हाथ जोड़ कर, विशिष्ट रीति से नमस्कार करता हॅूं ।