+ अलौकिक सिद्धस्वरूप तेज को नहीं देखने वाले मनुष्य मन्दबुद्धि -
तैरेव प्रतिपद्यतेऽत्र रमणी,-स्वर्णाऽऽदि-वस्तु प्रियं;
तत्सिद्धैक-मह: सदऽन्तर-दृशा, मन्दैर्न यैर्दृश्यते ।
ये तत्तत्त्व-रस-प्रभिन्न-हृदया:, तेषामऽशेषं पुन:;
साम्राज्यं तृणवद्वपुश्च परवद्, भोगाश्च रोगा इव ॥22॥
अन्तर्दृष्टि द्वारा न देखें, जो सिद्धों का तेज-स्वरूप ।
उन्हीं मन्दमति को लगते हैं, स्वर्ण-रमा रमणीयस्वरूप॥
जिनका हृदय तत्त्व-रस भीगा, भोग लगे हैं रोग समान ।
राज्य जीर्ण तृण सम वे मानें, तन को लखते भिन्न सुजान॥
अन्वयार्थ : जिन मनुष्यों ने अन्तरंग दृष्टि से उस अलौकिक सिद्धस्वरूप तेज को नहीं देखा है; उन मूर्ख मनुष्यों को स्त्री, सुवर्ण आदि पदार्थ ही प्रिय मालूम पड़ते हैं; किन्तु जिन भव्य जीवों का हृदय, उन सिद्धों के स्वरूपरूपी रस से परिपूर्ण हो गया है; वे भव्य जीव समस्त साम्राज्य को तृण के समान जानते हैं, शरीर को पर (वैरी) समझते हैं और उन्हें भोग, रोग के समान मालूम होते हैं ।