
वन्द्यास्ते गुणिनस्त एव भुवने, धन्यास्त एव ध्रुवं;
सिद्धानां स्मृतिगोचरं रुचिवशात्, नामाऽपि यैर्नीयते ।
ये ध्यायन्ति पुन: प्रशस्तमनस:, तान् दुर्गभूभृद्दरी;
मध्यस्था: स्थिरनासिकाग्रिमदृश:, तेषां किमु ब्रूमहे ॥23॥
प्रीति सहित स्मृति-गोचर, सिद्धों का नाम मात्र जपते ।
वे नर जग में गुणी धन्य अरु, वन्दनीय माने जाते॥
गिरि-शिखरों पर गुफा-मध्य में, करके जो दृष्टि नासाग्र ।
निर्मल मन से प्रभु को ध्याते, उनकी बात कहें हम क्या ?
अन्वयार्थ : जो मनुष्य, प्रीतिपूर्वक सिद्धों के नाम का भी स्मरण करते हैं, वे मनुष्य भी जब संसार में वन्दनीय, गुणी और धन्य समझे जाते हैं; तब जो मनुष्य, पवित्र चित्त से किले, पर्वतों की गुफा के मध्य में बैठ कर तथा नाक के अग्रभाग में दृष्टि लगा कर, उन सिद्धों का ध्यान तथा उनके स्वरूप का मनन-चिन्तवन करते हैं, उनकी हम क्या बात कहें? इसलिए भव्य जीवों को चाहिए कि वे उन सिद्धों के स्वरूप का भलीभाँति ध्यान करें । यदि ध्यान न हो सके तो उनके नाम का स्मरण अवश्य ही करें ।