
य: सिद्धे परमात्मनि प्रवितत,-ज्ञानैकमूर्तौ किल;
ज्ञानी निश्चयत: स एव सकल,-प्रज्ञावतामग्रणी: ।
तर्कव्याकरणादिशास्त्रसहितै:, किं तत्र शून्यैर्यतो;
यद्योगं विदधाति वेध्यविषये, तद्बाणमावर्ण्यते ॥24॥
विशद् ज्ञान की मूर्ति सिद्धप्रभु, को जो ज्ञानीजन जानें ।
निश्चय से वे ही सब विद्वानों में श्रेष्ठ कहे जाते॥
यदि सिद्धों का ज्ञान नहीं तो, व्यर्थ सभी शास्त्रों का ज्ञान ।
क्योंकि लक्ष्य को भेद सके जो, जगजन कहें उसी को बाण॥
अन्वयार्थ : विस्तीर्ण ज्ञान ही है एक स्वरूप जिनका - ऐसे सिद्ध परमात्मा में जो पुरुष, अपने ज्ञान द्वारा स्थित है अर्थात् सिद्धस्वरूप को जो भलीभाँति जानने वाला है, वास्तविक रीति से वही समस्त विद्वानों में मुख्य है - ऐसा समझना चाहिए । यदि न्यायशास्त्र तथा व्याकरण आदि शास्त्रों के जानकार भी हुए तथा हृदय से शून्य ही रहे तो उनसे कोई प्रयोजन नहीं है क्योंकि जो वेधने योग्य पदार्थ में निशान को लगाता है, वही बाण कहलाता है ।