
सिद्धात्मा परम: परं प्रविलसद्, बोध: प्रबुद्घात्मना;
येनाऽज्ञायि स किं करोति बहुभि:, शास्त्रैर्बहिर्वाचकै: ।
यस्य प्रोद्गत-रोचिरुज्ज्वलतनु:, भानु: करस्थो भवेत्;
ध्वान्तध्वंसविधौ स किं मृगयते, रत्नप्रदीपादिकान् ॥25॥
विलसित बोध-स्वरूप परम, सिद्धों को जिसने जान लिया ।
उस प्रबुद्ध को बाह्य शास्त्र, पढ़ने से कहो प्रयोजन क्या?
उदित रश्मियों सहित सूर्य यदि, विद्यमान कर में जिसके ।
अन्धकार के नाश हेतु वह, दीप-रत्न को क्यों खोजे ?
अन्वयार्थ : प्रबुद्ध है आत्मा जिसकी - ऐसे जिस जीव ने दैदीप्यमान ज्ञान के धारी तथा सर्वोत्कृष्ट - ऐसे सिद्ध भगवान के स्वरूप को जान लिया है, उस भव्य जीव को बाह्य शास्त्रों से क्या प्रयोजन है? अर्थात् कुछ भी प्रयोजन नहीं क्योंकि जिस मनुष्य के हाथ में, जिसकी किरण उदित हो रही है - ऐसा प्रकाशमान सूर्य मौजूद है; वह मनुष्य, अन्धकार का नाश करने के लिए क्या रत्न तथा प्रदीपादि पदार्थों का अन्वेषण करता है? अर्थात् कदापि नहीं ।