
सर्वत्र च्युतकर्मबन्धनतया, सर्वत्र सद्दर्शना:;
सर्वत्राऽखिलवस्तुजातविषय, व्यासक्तबोधत्विष: ।
सर्वत्र स्फुरदुन्नतोन्नतसदा,ऽऽनन्दात्मका निश्चला:;
सर्वत्रैव निराकुला: शिवसुखं, सिद्धा: प्रयच्छन्तु न: ॥26॥
कर्मबन्ध से रहित तथा जो, सद्-दर्शनमय हैं सर्वत्र ।
जगत्-प्रकाशक सम्यग्ज्ञान-किरण सम्पूर्ण आत्म में व्याप्त॥
सर्वोत्कृष्ट सदानन्दात्मक, अनुपम तेज प्रगट सर्वत्र ।
निश्चल और निराकुल शिवसुख, हमें प्रदान करें वे सिद्ध॥
अन्वयार्थ : जिन सिद्धों के समस्त आत्मप्रदेशों से सर्व कर्मबन्ध छूट गया है, जिसके समस्त आत्मप्रदेशों में समीचीन दर्शन मौजूद है अर्थात् जो सम्यग्दर्शन अथवा अनन्तदर्शन के धारक हैं, समस्त पदार्थों के समूह को जानने वाली सम्यग्ज्ञानरूपी किरण जिनके समस्त आत्मप्रदेशों में व्याप्त है, जिनके सर्वोत्कृष्ट सत्स्वरूप तथा आनन्दस्वरूप तेज स्फुरायमान है तथा जो निश्चल और निराकुल हैं - ऐसे सिद्ध भगवान, हमारे लिए मोक्षसुख प्रदान करें ।