
आत्मोत्तुङ्ग-गृहं प्रसिद्ध-बहिराद्या,-त्मप्रभेद-क्षणं;
बह्वात्माध्यवसान-सङ्गत-लसत्, सोपान-शोभान्वितम् ।
तत्रात्मा विभुरात्मनात्म-सुहृदो, हस्तावलम्बी समा-;
रुह्यानन्द-कलत्र-संगत-भुवं, सिद्ध: सदा मोदते ॥27॥
बहिरात्मादिक भेदयुक्त, उत्तंगरूप यह आत्म-भवन ।
विविध आत्म-परिणामरूप, सोपानों की शोभा अनुपम॥
आत्मारूपी परम मित्र का, हाथ पकड़ कर चेतनराज ।
होकर सिद्ध-सच्चिदानन्द, रमणी संग भोगे सुक्ख अपार॥
अन्वयार्थ : जहाँ से बहिरात्मा तथा अन्तरात्मा आदि के भेद को वास्तविक रीति से देख सकते हैं और जो आत्मा के अध्यवसान रूप मनोहर सीढ़ी से शोभायमान है -ऐसा यह आत्मारूपी ऊँचा मकान है । उस पर विभु आत्मा, आत्मा के द्वारा आत्मारूपी मित्र के हाथ का सहारा लेकर, सिद्ध बन कर, चिदानन्दस्वरूप स्त्रीसहित, सिद्धशिला पर सदा आनन्द-मग्न रहते हैं ।