+ सिद्धों का स्वरूप ही मुझे अत्यन्त प्रिय -
सैवैका सुगतिस्तदेव च सुखं, ते एव दृग्बोधने;
सिद्धानामपरं यदस्ति सकलं, तन्मे प्रियं नेतरत् ।
इत्यालोच्य दृढं त एव च मया, चित्ते धृता: सर्वदा;
तद्रूपं परमं प्रयातु-मनसा, हित्वा भवं भीषणम् ॥28॥
वही एक ही सुगति वही सुख, वे ही सम्यग्दर्शन-ज्ञान ।
और सभी कुछ सिद्धरूप जो, मुझे वही प्रिय और न आन॥
यह विचार दृढ़ करके उन-सा, परमरूप पाने का मन ।
भीषण भवभय तज कर अब मैं, करूँ सर्वदा उनका ध्यान॥
अन्वयार्थ : जो सिद्धों की गति है, वही एक सुगति है; जो उनका सुख है, वही वास्तविक सुख है; वे सिद्ध ही सम्यग्दर्शन और सम्यग्ज्ञान हैं; इस प्रकार यह तथा इनसे भिन्न और भी जो सिद्धों का स्वरूप है, वह समस्त मुझे प्रिय है; किन्तु इनसे अतिरिक्त कुछ भी मुझे प्रिय नहीं है - ऐसा मन में दृढ़ श्रद्धान करके, मैंने सर्व काल उन्हीं सिद्धों का ध्यान किया है; इसलिए मन से भयंकर संसार का भय छोड़ कर, मुझे उत्कृष्ट सिद्धों के स्वरूप की प्राप्ति हो - ऐसी आशा करता हॅूं ।