
ज्ञानं दर्शनमप्यशेष-विषयं, सौख्यं तथाऽत्यन्तिकं;
वीर्यं च प्रभुता च निर्मलतरा, रूपं स्वकीयं तव ।
सम्यग्योगदृशा जिनेश्वर! चिरात्, तेनोपलब्धे त्वयि;
ज्ञातं किं न विलोकितं न किमथ, प्राप्तं न किं योगिभि: ॥5॥
लोकालोक विलोक दर्शन-ज्ञान और सुख-वीर्य अनन्त ।
अतिशय निर्मल प्रभुतामय हे प्रभो! आपका रूप अनन्त॥
सम्यक् योगदृष्टि से जिनवर, यदि आपको प्राप्त किया ।
उस योगी ने क्या नहिं पाया, और नहीं क्या जान लिया॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! समस्त लोकालोक को एक साथ जानने वाला आपका ज्ञान है; समस्त लोकालोक को एक साथ देखने वाला आपका दर्शन है; आपके अनन्त सुख और अनन्त बल हैं; आपका प्रभुपना भी अतिशय निर्मल है और शरीर भी दैदीप्यमान है । इसलिए यदि योगीश्वरों ने समीचीन योगरूपी नेत्र से आपको प्राप्त कर लिया तो उन्होंने क्या नहीं जाना? क्या नहीं देखा? और क्या नहीं पा लिया?