+ जिनेन्द्र भगवान को मानने से ही सर्व प्रयोजन-सिद्धि -
त्वामेकं त्रिजगत्पतिं परमहं, मन्ये जिनं स्वामिनं;
त्वामेकं प्रणमामि चेतसि दधे, सेवे स्तुवे सर्वदा ।
त्वामेकं शरणं गतोऽस्मि बहुना, प्रोक्तेन किंचिद्भवेत्;
इत्थं तद्भवतु प्रयोजनमतो, नाऽन्येन मे केनचित् ॥6॥
प्रभो! आप ही तीन लोक के, स्वामी मैं ऐसा मानूँ ।
अत: आपका ही वन्दन-स्तवन तथा मैं ध्यान करूँ॥
मात्र आपकी शरण गहूँ मैं, और अधिक कहने से क्या?
यही चाहता सिवा आपके, अन्य प्रयोजन नहिं मेरा॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! मैं आपको तीन लोक का स्वामी मानता हूँ , अष्ट कर्मों को जीतने वाला और अपना स्वामी मानता हूँ, केवल आपको ही भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ और सदा आपका ध्यान करता हूँ, आपकी ही सेवा और स्तुति करता हॅूं तथा केवल आपको ही मैं अपना शरण मानता हूँ । अधिक कहने से क्या लाभ? यदि संसार में मुझे कुछ प्राप्त हो तो यही हो कि आपके सिवाय अन्य किसी से भी मेरा प्रयोजन न रहे ।