+ त्रिकालवर्ती पापों की कृत-कारित-अनुमोदना एवं तीनों योगों से निन्दा -
पापं कारितवान् यदत्र कृतवान्, अन्यै: कृतं साध्विति;
भ्रान्त्याऽहं प्रतिपन्नवांश्च मनसा, वाचा च कायेन च ।
काले सम्प्रति यच्च भाविनि नव,-स्थानोद्गतं यत्पुन:;
तन्मिथ्याऽखिलमस्तु मे जिनपते, स्वं निन्दतस्ते पुर: ॥7॥
हे जिन! मैंने भूतकाल में, भ्रान्ति से जो पाप किये ।
अन्य जनों से करवाये, अनुमोदन की, मन-वच-तन से॥
वर्तमान में भी होते, नव कोटि से आगे होंगे ।
प्रभो! आपके सन्मुख मुझ, निन्दक के वे सब मिथ्या हो॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश्वर! भूतकाल में भ्रमवश जो पाप, मैंने मन-वचन-काय के द्वारा दूसरों से कराये है, स्वयं किये हैं और दूसरों को पाप करते हुए अच्छा कहा है अर्थात् उसमें अपनी सम्मति दी है; वर्तमान में जो पाप, मैं मन-वचन-काय के द्वारा स्वयं करता हूँ, दूसरों से कराता हॅूं और अन्य को करते हुए भला कहता हूँ; भविष्यकाल में जो पाप मैं मन-वचनकाय से स्वयं करूँगा, दूसरों से कराऊँगा और दूसरे को करते हुए अच्छा मानूँगा; वे समस्त पाप, आपके सामने अपनी निन्दा करने वाले मेरे, सर्वथा मिथ्या हों ।