
लोकाऽलोकमनन्त-पर्यय-युतं, काल-त्रयी-गोचरं;
त्वं जानासि जिनेन्द्र! पश्यसि तरां, शश्वत्समं सर्वत: ।
स्वामिन्! वेत्सि ममैकजन्मजनितं, दोषं न किंचित्कुतो;
हेतोस्ते परत: स वाच्य इति मे, शुद्धयर्थमालोचितुम् ॥8॥
कालत्रयी गोचर अनन्त, पर्याय सहित सब लोकालोक ।
शाश्वत युगपत् सर्व ओर से, आप जानते हैं जिनदेव॥
स्वामिन्! मेरे एक जन्म के, दोषों को क्या नहिं जानो ।
मैं निन्दक तव सन्मुख दोष, कहूँ शुद्धि के लिए अहो !
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! यदि तुम भूत, भविष्यत् व वर्तमान तीनों कालों की नाना पर्यायों सहित लोक तथा अलोक को चारों ओर से एक साथ जानते हो तथा देखते हो तो हे स्वामिन्! मेरे एक जन्म में होने वाले पापों को क्या तुम नहीं जानते हो ? इसलिए अपने को स्वयं निन्दित करता हुआ मैं, आपके सामने जो अपने दोषों का कथन करता हूँ, वह केवल अपनी शुद्धि के लिए ही करता हूँ ।