+ माया-मिथ्या-निदान - इन तीन शल्यों के त्याग की प्रेरणा -
आश्रित्य व्यवहारमार्गमथवा, मूलोत्तराख्यान् गुणान्;
साधोर्धारयतो मम स्मृतिपथं, प्रस्थायि यद्दूषणम् ।
शुद्धयर्थं तदपि प्रभो तव पुर:, सज्जोऽहमालोचितुं;
नि:शल्यं हृदयं विधेयमजडै:, भव्यैर्यत: सर्वथा ॥9॥
व्यवहाराश्रित मूल और, उत्तरगुणधारी मैं साधु ।
स्मृति-पथ पर जो भी आते, हैं वे सब मैं दोष कहूँ॥
शुद्धि हेतु हे प्रभु! तव सन्मुख, सावधान होकर बैठा ।
क्योंकि विवेकी भव्य जीव, निज हदय रखें नि:शल्य सदा॥
अन्वयार्थ : व्यवहारनय का आश्रय करके अथवा मूलगुण तथा उत्तरगुणों को धारण करने वाले मुझ मुनि को जिस दूषण का भलीभाँति स्मरण है, उस दूषण की शुद्धि के अर्थ आलोचना करने के लिए हे प्रभो! मैं आपके सामने सावधानी से बैठा हूँ क्योंकि भव्य जीवों को सदा अपना मन, माया-मिथ्या-निदान - इन तीनों शल्यों से रहित रखना चाहिए ।