+ जितने दोष, उतने प्रायश्चित्त के अभाव में प्रभु-समीप रहने मात्र से शुद्धि -
सर्वोऽप्यत्र मुहुर्मुहुर्जिनपते, लोकैरसंख्यैर्मित-;
व्यक्ताऽव्यक्तविकल्पजालकलित:, प्राणी भवेत्संसृतौ ।
तत्तावद्भिरयं सदैव निचितो, दोषैर्विकल्पाऽनुगै:;
प्रायश्चित्तमियत्कुत: श्रुतगतं, शुद्धिर्भवत्सन्निधे: ॥10॥
व्यक्त-अव्यक्त विकल्प जाल हैं, असंख्य लोक प्रमाण प्रभो !
बार-बार ये जीव जगत् के, उनसे हों संयुक्त विभो !
उन विकल्पों के आश्रय से, होते हैं दोष सदा उत्पन्न ।
सबका प्रायश्चित नहिं श्रुत में, शुद्धि आपके पास जिनेन्द्र !
अन्वयार्थ : हे भगवन्! इस संसार में समस्त जीव, बार-बार असंख्यात लोकप्रमाण प्रकट तथा अप्रकट नाना प्रकार के विकल्पों से सहित हैं तथा उनसे उत्पन्न होने वाले उतने ही प्रकार के दोषों से भी सहित हैं; किन्तु जितने प्रकार के दोष हैं, उतने प्रायश्चित्त, शास्त्रों में नहीं हैं; इसलिए उन समस्त असंख्यात लोकप्रमाण विकल्पों तथा दोषों की शुद्धि, केवल आपके समीप में ही होती है ।