
भावाऽन्त:करणेन्द्रियाणि विधिवत्, संहृत्य बाह्याश्रयात्;
एकीकृत्य पुनस्त्वया सह शुचि,-ज्ञानैकसन्मूर्तिना ।
नि:सङ्ग: श्रुतसारसंगतमति:; शान्तो रह: प्राप्तवान्;
यस्त्वां देव! समीक्षते स लभते, धन्यो भवत्सन्निधिम् ॥11॥
बाह्य पदार्थों से भावेन्द्रिय-मन को विधिवत् करें पृथक् ।
अद्वितीय शुचि ज्ञान मूर्तिमय, प्रभो! आपसे हों अपृथक॥
श्रुत रहस्य ज्ञाता परिग्रह बिन, शान्त चित्त बैठे एकान्त ।
भव्य आपको देखे जो वह, होता आप समीप सुधन्य॥
अन्वयार्थ : हे भगवान्! समस्त प्रकार के परिग्रहों से रहित, समस्त शास्त्रों को जानने वाला, क्रोधादि कषायों से रहित और एकान्तवासी - ऐसा जो भव्य जीव, समस्त बाह्य पदार्थों से मन तथा इन्द्रियों को हटा कर, अखण्ड और निर्मल सम्यग्ज्ञानरूपी मूर्ति के धारी आपमें स्थिर होकर, आपको देखता है; वह मनुष्य, आपकी समीपता को प्राप्त होता है ।