+ चित्त का बाह्य विषयों में दौड़-दौड़ कर जाना - खेद का विषय -
त्वामाऽऽसाद्य पुराकृतेन महता, पुण्येन पूज्यं प्रभुं;
ब्रह्माद्यैरपि यत्पदं न सुलभं, तल्लभ्यते निश्चितम् ।
अर्हन्नाथ! परं करोमि किमहं, चेतो भवत्सन्निधौ;
अद्याऽपि ध्रियमाणमप्यतितरा,-मेतद्बहिर्धावति ॥12॥
परम-पूज्य जिन महापुण्य से, आज आपका दर्शन पा ।
जो पद ब्रह्मादिक को दुर्लभ, वह पद निश्चित पा सकता॥
किन्तु आपमें बलपूर्वक यह, चित्त लगाने पर भी नाथ !
बाह्य वस्तु में दौड़ रहा मन, हे प्रभु! कहो करूँ मैं क्या ?
अन्वयार्थ : हे भगवन्! पूर्वभव में कष्ट से सञ्चय किए हुए बड़े भारी पुण्य से जिस मनुष्य ने तीन लोक द्वारा पूजनीय आपको पा लिया है, उस मनुष्य को उस उत्तम पद की प्राप्ति होती है, जिसको निश्चय से ब्रह्मा-विष्णु आदि भी नहीं पा सकते; परन्तु हे अर्हज्जिनेन्द्र! हे नाथ! मैं क्या करूँ? आपके समीप में लगा हुआ मेरा चित्त, प्रबल रीति से बाह्य पदार्थों की ओर ही दौड़ता है ।