
संसारो बहु-दु:खद:, सुखपदं निर्वाणमेतत्कृते;
त्यक्त्वाऽर्थादि तपोवनं वयमिता:, तत्रोज्झित: संशय: ।
एतस्मादपि दुष्करव्रतविधे:, नाद्याऽपि सिद्धिर्यतो;
वातालीतरलीकृतं दलमिव, भ्राम्यत्यदो मानसम् ॥13॥
यह संसार महादु:खमय है, सुखमय शाश्वत पद निर्वाण ।
उसके लिए संग-तज वन में, तप धारा छोड़ा सन्देह॥
अति कठोर व्रत करने पर भी, मोक्ष न अबतक प्राप्त हुआ ।
क्योंकि पवन प्रेरित पत्ते-सम, यह मन बाहर ही भ्रमता॥
अन्वयार्थ : हे जिनेश! यह संसार तो नाना प्रकार के दु:खों को देने वाला है और मोक्ष वास्तविक सुख का स्थान है अर्थात् वास्तविक सुख को देने वाला है । इसलिए उस मोक्ष की प्राप्ति के लिए हमने समस्त धन-धान्य आदि परिग्रहों का त्याग किया, तपोवन को भी प्राप्त हुए, समस्त प्रकार का संशय भी छोड़ दिया, अत्यन्त कठोर व्रत भी धारण किये; किन्तु अभी तक उन कठिन व्रतों को धारण करने से भी सिद्धि की प्राप्ति नहीं हुई क्योंकि पवन के समूह से कम्पित हुए पत्तों के समान हमारा मन, रात-दिन बाह्य पदार्थों में ही भ्रमण करता है ।