+ मन के जीवित रहने पर मुनियों का भी कल्याण असम्भव -
झम्पा: कुर्वदितस्तत: परिलसद्, बाह्यार्थलाभाद्ददत्;
नित्यं व्याकुलतां परां गतवत:, कार्यं विनाप्यात्मन: ।
ग्रामं वासयदिन्द्रियं भवकृतो, दूरं सुहृत्कर्मण:;
क्षेमं तावदिहाऽस्ति कुत्र यमिनो, यावन्मनो जीवति ॥14॥
बाह्यार्थों की प्राप्ति हेतु जो, इधर उधर भ्रमता-फिरता ।
बिना प्रयोजन जो निज में, उत्पन्न करे नित व्याकुलता॥
इन्द्रिय-विषय में रमता भव-कारक कर्मों को लाता ।
यह मन जब तक जीवित मुनि का, कभी मुक्त नहिं हो सकता॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! जो बाह्य पदार्थों को मनोहर मान कर, उनकी प्राप्ति के लिए जहाँ-तहाँ भटकता है, जो ज्ञानस्वरूपी आत्मा को भी बिना प्रयोजन सदा अत्यन्त व्याकुल करता रहता है, जो इन्द्रियरूपी गाँव को बसाने वाला है अर्थात् इस मन की कृपा से ही इन्द्रियों के विषयों में स्थिति होती है, जो संसार को पैदा करने वाले कर्मों को लाता रहता है - ऐसा यह मन, जब तक जीवित रहता है, तब तक मुनियों को कदापि कल्याण की प्राप्ति नहीं हो सकती ।