
नूनं मृत्युमुपैति यातममलं, त्वां शुद्धबोधाऽऽत्मकं;
त्वत्तस्तेन बहिर्भ्रमत्यविरतं, चेतो विकल्पाऽऽकुलम् ।
स्वामिन् किं क्रियतेऽत्र मोहवशतो, मृत्योर्न भी: कस्य तत्;
सर्वाऽनर्थपरम्पराकृदऽहितो, मोह: स मे वार्यताम् ॥15॥
निर्मल शुद्ध ज्ञानमय तुमको, पाकर मन निश्चित मरता ।
अत: विकल्पाकुलित चित्त यह, बाहर ही भ्रमता रहता॥
हे स्वामी! क्या करें? मोह वश, सभी मृत्यु से डरते हैं ।
अत: अनर्थ-अहितकारी मम, मोह शीघ्र अब नष्ट करें॥
अन्वयार्थ : निर्मल तथा अखण्ड ज्ञानस्वरूप आपको पाकर मेरा मन, मृत्यु को प्राप्त हो जाता है; इसलिए हे जिनेन्द्र! नाना प्रकार के विकल्पों से युक्त मेरा चित्त, आपसे बाह्य समस्त पदार्थों में ही निरन्तर घूमता फिरता है क्योंकि क्या किया जाए? मृत्यु से सर्व ही डरते हैं; अत: यह सविनय प्रार्थना है कि समस्त प्रकार के अनर्थों को करने वाले तथा अहितकारी, इस मोह को शीघ्र नष्ट करो ।