
आधि-व्याधि, जरा-मरण से रहित मेरी ज्ञानवान् आत्मा
आधि-व्याधि-जरा-मृति-प्रभृतय:,सम्बन्धिनो वर्ष्मण:;
तद्भिन्नस्य ममाऽऽत्मनो भगवत:, किं कर्तुमीशा जडा: ।
नानाऽऽकार-विकार-कारिण इमे, साक्षान्नभो-मण्डले;
तिष्ठन्तोऽपि न कुर्वते जलमुच:, तत्र स्वरूपाऽन्तरम् ॥21॥
आधि-व्याधि-जरा-मरणादिक, तन-सम्बन्धी रोग अरे !
इनसे भिन्न आत्म-भगवन् मैं, ये मेरा क्या कर सकते ?
नभ-मण्डल में मेघ करें ज्यों, विविध भाँति आकार-विकार॥
किन्तु न कुछ कर सकते नभ का, वह तो सदा रहे अविकार॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! नाना प्रकार के आकारों तथा विकारों को करने वाले मेघ आकाश में रहते हुए भी जिस प्रकार आकाश के स्वरूप का कुछ भी हेर-फेर नहीं करते; उसी प्रकार आधि, व्याधि, जरा, मरण आदि मुझमें कुछ भी नहीं कर सकते क्योंकि ये समस्त शरीर के विकार जड़ हैं तथा मेरी आत्मा ज्ञानवान् और शरीर से भिन्न है ।