
संसाराऽऽतप-दह्यमान-वपुषा, दु:खं मया स्थीयते;
नित्यं नाथ! यथा स्थलस्थितिमता, मत्स्येन ताम्यन्मन: ।
कारुण्याऽमृत-संग-शीतलतरे, त्वत्पाद-पंकेरुहे;
यावद्देव समर्पयामि हृदयं, तावत्परं सौख्यवान् ॥22॥
भवाताप से जलता यह तन, धारण कर मैं दु:खी हुआ ।
यथा मत्स्य-जल के बाहर, भू पर रह कर अति दु:खी हुआ॥
करुणामृत के संग से शीतल, हे प्रभु! तेरे चरण-युगल ।
उनमें करूँ समर्पण अपना, हृदय करे सुख का अनुभव॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! जिस प्रकार जल से बाहर स्थल में पानी के बिना मछली तड़फती रहती है, उसी प्रकार संसाररूपी सन्ताप से जिसका शरीर जल रहा है - ऐसा मैं सदा दु:खी ही रहता हूँ; किन्तु जब करुणारूपी जल के संग से अत्यन्त शीतल आपके चरणकमलों में मैं अपने मन को लगाता हूँ; तब मैं अत्यन्त सुखी होता हॅूं ।