+ मन का बाह्य पदार्थों से सम्बन्ध कर्म-बन्ध का कारण -
साऽक्षग्राममिदं मनो भवति यत्, बाह्याऽर्थ-सम्बन्ध-भाक्;
तत्कर्म प्रविजृम्भते पृथगऽहं, तस्मात् सदा सर्वथा ।
चैतन्यात्तव तत्तथेति यदि वा, तत्राऽपि तत्कारणं;
शुद्धात्मन्! मम निश्चयात्पुनरिह, त्वय्येव देव! स्थिति: ॥23॥
बाह्य पदार्थों से जुड़ता है, इन्द्रियों से सहित ये मन ।
अत: कर्म बँधते हैं मुझमें, किन्तु सदा मैं उनसे भिन्न॥
प्रभो! आप भी चेतनमय हैं, अत: आप कर्मों से भिन्न ।
हे शुद्धात्मन! निश्चय से मैं, सदा आप में रहूँ विलीन॥
अन्वयार्थ : हे भगवन्! इन्द्रियों के समूह से सहित मेरा मन, बाह्य पदार्थों से सम्बन्ध करता है; उसी कारण नाना प्रकार के कर्म, मेरी आत्मा के साथ आकर बँधते हैं; किन्तु वास्तविक रीति से मैं उन कर्मों से सर्व काल तथा सर्व क्षेत्र में जुदा ही हूँ । आपके चैतन्य से भी वे कर्म सर्वथा जुदे ही हैं । आपके उस चैतन्य से कर्मों का भेद करने में आप ही कारण हैं । इसलिए हे शुद्धात्म जिनेन्द्र! निश्चय से मेरी स्थिति आप ही में हैं ।