+ लोक, बाह्य द्रव्य, शरीर-इन्द्रिय-वचन आदि सभी पुद्गल की पर्यायें -
किं लोकेन किमाऽऽश्रयेण किमुत, द्रव्येण कायेन किं;
किं वाग्भि: किमुतेन्द्रियै: किमसुभि:, किं तैर्विकल्पैरपि ।
सर्वे पुद्गल-पर्यया बत परे, त्वत्त: प्रमत्तो भवन्;
आत्मन्नेभिरभिश्रयस्यति तरा,-मालेन किं बन्धनम् ॥24॥
हे आत्मन् क्या तुम्हें प्रयोजन, लोक पराश्रय या तन से ?
वाणी-इन्द्रिय-प्राणों से क्या, काम विविध विकल्पों से ?
क्योंकि सभी पुद्गल-पर्यायें, तुम तो हो इनसे अति भिन्न ।
किन्तु खेद! क्यों हुए प्रमादी, व्यर्थ करो कर्मों का बन्ध ?
अन्वयार्थ : हे आत्मन्! न तो तुझे इस लोक से काम है और न दूसरे के आश्रय से काम है । न तुझे द्रव्य से प्रयोजन है और न शरीर से प्रयोजन है । वचन और इन्द्रियों से भी तुझे कुछ काम नहीं है, प्राणों से भी तेरा प्रयोजन नहीं है तथा नाना प्रकार के विकल्पों से भी तुझे कुछ काम नहीं है क्योंकि ये समस्त पुद्गलद्रव्य की ही पर्यायें हैं और तुझसे भिन्न हैं । तो भी बड़े खेद की बात है कि तू इनको अपना मान कर, इनका आश्रय करता रहता है; अत: क्या तू दृढ़ बन्धन को प्राप्त नहीं होगा?