
धर्माऽधर्म-नभांसि काल इति मे, नैवाहितं कुर्वते;
चत्वारोऽपि सहायतामुपगता:, तिष्ठन्ति गत्यादिषु ।
एक: पुद्गल एव सन्निधिगतो, नोकर्मकर्माऽऽकृति:;
वैरी बन्धकृदेष सम्प्रति मया, भेदाऽसिना खण्डित: ॥25॥
धर्म-अधर्माकाश-काल नहिं, मेरा कोई अहित करें ।
ये चारों गति-स्थिति आदि, में सहायता मुझे करें॥
किन्तु कर्म-नोकर्मरूप में, पुद्गल-बैरी पास रहें ।
बन्ध करें यह अत: ज्ञान से, मैंने उसके खण्ड किये॥
अन्वयार्थ : धर्मद्रव्य, अधर्मद्रव्य, आकाशद्रव्य, कालद्रव्य - ये चार द्रव्य मेरा किसी प्रकार अहित करने वाले नहीं हैं; किन्तु ये चारों द्रव्य गति-स्थिति आदि कार्यों में सहकारी हैं, इसलिए यह मेरे सहायक होकर ही रहते हैं, लेकिन नोकर्म तथा कर्म है स्वरूप जिसका - ऐसा समीप में रहने वाला और बन्ध करने वाला एक पुद्गल ही मेरा बैरी है, अत: भेदज्ञानरूपी तलवार से मैंने उस पुद्गल के खण्ड-खण्ड कर दिये हैं ।