+ राग-द्वेषरूप पुद्गल-परिणामों से ही पौद्गलिक कर्म की उत्पत्ति -
राग-द्वेष-कृतैर्यथा परिणमेत्, रूपाऽन्तरै: पुद्गलो;
नाऽऽकाशादिचतुष्टयं विरहितं, मूर्त्या तथा प्राणिनाम् ।
ताभ्यां कर्म-घनं भवेदऽविरतं, तस्मादियं संसृति:;
तस्यां दु:ख-परम्परेति विदुषा, त्याज्यौ प्रयत्नेन तौ ॥26॥
राग-द्वेषकृत परिणामों से, पुद्गल में परिणमन सदा ।
आकाशादि अमूर्तिक में नहिं, कर्मरूप परिणमन कदा ।
राग-द्वेष से प्रबल कर्म हों, जिनसे होता है संसार ।
इसमें जीव दु:खी रहता है, सुधी करें उनका परिहार॥
अन्वयार्थ : जीवों के नाना प्रकार से युक्त राग-द्वेष परिणामों से जिस प्रकार पुद्गलद्रव्य परिणमित होता है; उसी प्रकार धर्म, अधर्म, आकाश तथा काल - ये चार अमूर्तिक द्रव्य राग-द्वेष को करने वाले परिणामों से परिणमित नहीं होते । उन राग-द्वेष के द्वारा प्रबल कर्मों की उत्पत्ति होती है, उन कर्मों से संसार होता है । संसार में नाना प्रकार के दु:ख भोगने पड़ते हैं, इसलिए स्व-कल्याण की अभिलाषा करने वाले सज्जनों को चाहिए कि वे राग-द्वेष को सर्वथा छोड़ दें ।