+ स्त्री-पुत्रादि से राग-द्वेष छोड़ कर, शुद्धात्मा में निवास करने की प्रेरणा -
किं बाह्येषु परेषु वस्तुषु मन:, कृत्वा विकल्पान् बहून्;
राग-द्वेष-मयान् मुधैव कुरुषे, दु:खाय कर्माऽशुभम् ।
आनन्दाऽमृत-सागरे यदि वसस्याऽऽसाद्य शुद्धात्मनि;
स्फीतं तत्सुखमेकतामुपगतं, त्वं यासि रे निश्चितम् ॥27॥
रे मन! बाह्य पदार्थों में क्यों, राग-द्बेषमय विविध विकल्प ।
करता है तू दु:खदायक इन, अशुभरूप कर्मों का बन्ध ?
आनन्दामृत सागर शुद्धात्मा में यदि तू हो एकाग्र ।
रमे उसी में तो निश्चित ही, शिवसुख होगा तुमको प्राप्त॥
अन्वयार्थ : हे मन! बाह्य तथा तुझसे भिन्न - स्त्री-पुत्रादि पदार्थ हैं, उनमें राग-द्वेषस्वरूप अनेक विकल्पों को करके तू क्यों व्यर्थ दु:खी होकर अशुभकर्म बाँधता है? यदि तू आनन्दरूपी अमृत के समुद्र में शुद्धात्मा को पाकर, उसमें निवास करेगा तो तू विस्तीर्ण निर्वाणरूपी सुख को अवश्य प्राप्त करेगा, इसलिए तुझे शुद्धात्मा में ही निवास करना चाहिए और उसी का ध्यान तथा मनन करना चाहिए ।