
इत्याऽऽध्याय हदि स्थिरं जिन भवत्, पादप्रसादात्सतीं;
अध्यात्मैक-तुला-मयं जन इत:, शुद्धयर्थमारोहति ।
एवं कर्तुममी च दोषिणमित:, कर्माऽरयो दुर्धरा:;
तिष्ठन्ति प्रसभं तदत्र भगवन्, मध्यस्थसाक्षी भवान् ॥28॥
प्रभु चरणों के ही प्रसाद से, इन बातों को मन में धार ।
शुद्धि हेतु अध्यात्म तुला पर, करते हैं जन-आरोहण॥
उन्हें दोषयुत करने बैठे, बलपूर्वक यह करमरिपु ।
इसी तुला पर हे भगवन्! तुम, साक्षी बन मध्यस्थ रहे॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्र! आपके चरण-कमलों की कृपा से पूर्वोक्त बातों का भलीभाँति मनन कर, जिस समय यह प्राणी, शुद्धि के लिए अध्यात्मरूपी तुला पर चढ़ता है; उस समय उसको दोषी बनाने के लिए कर्मरूपी भयंकर वैरी घुस जाते हैं, इसलिए हे भगवान्! ऐसी दशा में आप ही साक्षी हैं ।