+ सविकल्प ध्यान, संसार-स्वरूप और निर्विकल्प ध्यान, मोक्ष-स्वरूप -
द्वैतं संसृतिरेव निश्चय-वशात्, अद्वैतमेवाऽमृतं;
संक्षेपादुभयत्र जल्पितमिदं, पर्यन्त-काष्ठाऽऽगतम् ।
निर्गत्याद्य-पदाच्छनै: शबलितादऽन्यत्समालम्बते;
य: सोऽसंज्ञ इति स्फुटं व्यवहृते:, ब्रह्मादिनामेति च ॥29॥
निश्चय से संसार द्वैत है, अमृतरूप सदा अद्वैत ।
बन्ध-मोक्ष के बारे में यह, अन्तिम कथन किया संक्षेप॥
विविध विकल्प स्वरूप द्वैत तज, ले अद्वैत का आलम्बन ।
नामों से भी पार हुआ वह, जग देता ब्रह्मादिक नाम॥
अन्वयार्थ : वास्तविक रीति से द्वैतरूप सविकल्प ध्यान तो संसारस्वरूप है । अद्वैतरूप निर्विकल्प ध्यान मोक्षस्वरूप है - यह संसार तथा मोक्ष के सम्बन्ध में चरम सीमा को प्राप्त संक्षेप कथन है । जो मनुष्य, इन दोनों में से नाना विकल्प वाले द्वैत पद से हट कर, अद्वैत पद का आलम्बन करता है; वह पुरुष, वास्तविक रीति से नामरहित हो जाता है अथवा उसी पुरुष को व्यवहारनय से ब्रह्मा-विधाता आदि नाम से पुकारते हैं ।