
कलिकाल में मुक्तिदायक चारित्र कठिन, परन्तु प्रभु भक्ति सरल
चारित्रं यदभाणि केवल-दृशा, देव त्वया मुक्तये;
पुंसा तत्खलु मादृशेन विषमे, काले कलौ दुर्धरम् ।
भक्तिर्या समभूदिह त्वयि दृढा, पुण्यै: पुरोपार्जितै:;
संसाराऽर्णवतारणे जिन तत:, सैवाऽस्तु पोतो मम ॥30॥
चारित्र को मुक्ति का कारण, कहे आपका केवलज्ञान ।
मुझ जैसों के लिए कठिन है, कलि में वह चारित्र महान॥
पूर्व पुण्य से प्रभो! आपके, प्रति दृढ़ भक्ति है मेरी ।
भव-समुद्र तरने हेतु है, दृढ़ जहाज भक्ति तेरी॥
अन्वयार्थ : हे जिनेन्द्रदेव! आपने, केवलज्ञानरूपी दृष्टि से, मुक्ति की प्राप्ति के लिए चारित्र का वर्णन किया है, उस चारित्र को इस भयंकर कलिकाल में मेरे समान मनुष्य, बड़ी कठिनता से धारण कर सकता है; किन्तु पूर्वकाल में सञ्चित पुण्य से आपमें जो मेरी दृढ़ भक्ति है, वही संसाररूपी समुद्र से पार करने में जहाज के समान है अर्थात् वही भक्ति, मुझे संसार-समुद्र से पार कर सकेगी ।