
इन्द्रत्वं च निगोदतां च बहुधा, मध्ये तथा योनय:;
संसारे भ्रमता चिरं यदऽखिला:, प्राप्ता मयाऽनन्तश: ।
तन्नापूर्वमिहास्ति किंचिदपि मे, हित्वा विमुक्ति-प्रदां;
सम्यग्दर्शन-बोध-वृत्तिपदवीं, तां देव पूर्णां कुरु ॥31॥
प्रभु निगोद से इन्द्रपना तक, मध्यवर्ति सारी पर्याय ।
प्राप्त हुई संसार-भ्रमण, करते-करते मुझको चिर काल॥
सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चरित के, सिवा न कोई मुझे अपूर्व ।
मुक्ति-प्रदायी है यह पदवी, प्रभो! कीजिए इसको पूर्ण॥
अन्वयार्थ : हे भगवान्! इस संसार में भ्रमणपूर्वक मैंने इन्द्रपना निगोदपना तथा अन्य भी समस्त प्रकार की योनियाँ अनन्त बार प्राप्त की हैं; इसलिए इन पदवियों में से कोई भी पदवी मेरे लिए अपूर्व नहीं है; किन्तु मोक्ष को देने वाली सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्ररूपी पदवी अभी तक नहीं मिली है; इसलिए हे भगवन्! यह प्रार्थना है कि सम्यग्दर्शनसम्यग्ज्ञान-सम्यक्चारित्र की पदवी को ही पूर्ण करो अर्थात् वह मुझे प्राप्त होवे ।