+ सिद्धपद के उपदेश के सामने तीन लोक का साम्राज्य भी अप्रिय -
श्रीवीरेण मम प्रसन्न-मनसा, तत्किंचिदुच्चै: पद-;
प्राप्त्यर्थं परमोपदेश-वचनं, चित्ते समारोपितम् ।
येनास्तामिदमेक-भूतल-गतं, राज्यं क्षणध्वंसि यत्;
त्रैलोक्यस्य च तन्न मे प्रियमिह, श्रीमज्जिनेश प्रभो !32॥
वीरनाथ ने मुझे दिया है, प्रसन्न मन से जो उपदेश ।
ऊँचे पद की प्राप्ति हेतु, मेरे मन में रोपा सन्देश॥
तत्प्रभाव से पृथ्वीतल के, क्षणभंगुर सुख की क्या बात? ।
हे जिनेन्द्र प्रभु! मुझे न प्रिय है, तीन लोक का भी साम्राज्य॥
अन्वयार्थ : बाह्य तथा अभ्यन्तर लक्ष्मी से शोभित श्री वीर भगवान ने प्रसन्न-चित्त से सबसे ऊँचे सिद्धपद की प्राप्ति के लिए मेरे चित्त को जो उपदेश दिया है; उस उपदेश के सामने तीन लोक का राज्य भी मुझे प्रिय नहीं है तो क्षणभर में विनाशीक - ऐसा पृथ्वी का राज्य तो कैसे प्रिय होगा? अर्थात् नहीं होगा ।