+ उपसंहार में इस आलोचना अधिकार के त्रिकाल पाठ का उपदेश -
सूरै: पंकज-नन्दिन: कृतिमिमामाऽऽलोचनामर्हतां;
अग्रे य:पठति त्रि-सन्ध्यममल,-श्रद्धा-नताऽङ्गो नर: ।
योगीन्द्रैश्चिर-काल-रूढ-तपसा, यत्नेन यन्मृग्यते;
तत्प्राप्नोति परं पदं स मतिमानाऽऽनन्दसद्म धु्रवम् ॥33॥