
यज्जानन्नपि बुद्धिमानपि गुरु:, शक्तो न वक्तुं गिरा;
प्रोक्तं चेन्न तथापि चेतसि नृणां, सम्माति चाकाशवत् ।
यत्र स्वानुभव-स्थितेऽपि विरला, लक्ष्यं लभन्ते चिरात्;
तन्मोक्षैक-निबन्धनं विजयते, चित्तत्त्वमत्यद्भुतम् ॥1॥
(वीर छन्द)
जिसे जान कर भी न कह सके, बृहस्पति जैसे मतिमान ।
कहें यदि तो भी जन-मन में, आ न सके आकाश समान॥
स्वानुभूति करके ही विरले, मुक्ति प्राप्त करते चिरकाल ।
अद्भुत आत्मतत्त्व जयवन्तो, यही मुक्ति का कारण जान॥
अन्वयार्थ : मोक्षरूपी सुख को देने वाले आत्मतत्त्व को भलीभाँति जानता हुआ बुद्धिमान बृहस्पति भी अपनी वाणी से उस तत्त्व का कुछ भी वर्णन नहीं कर सकता है । यदि किसी प्रकार वर्णन करें तो भी आकाश के समान अत्यन्त विस्तीर्ण होने के कारण मनुष्यों के हृदय में उसको समाविष्ट नहीं कर सकते । स्वानुभव में स्थित होकर विरले ही प्राणी, जिस आत्मतत्त्व का लक्ष्य करते हैं - ऐसा वह अत्यन्त आश्चर्ययुक्त आत्मतत्त्व इस लोक में जयवन्त है ।