+ आत्मतत्त्व का अनेकान्तस्वरूप एवं उसकी गहनता -
नित्याऽनित्यतया महत्तनुतया,ऽनेकैक-रूपत्ववत्;
चित्तत्त्वं सदसत्तया च गहनं, पूर्णं च शून्यं च यत् ।
तज्जीयादखिलश्रुताश्रय-शुचि,-ज्ञान-प्रभा-भासुरो;
यस्मिन् वस्तु-विचारमार्गचतुरो, य: सोऽपि सम्मुह्यति ॥2॥
चेतनतत्त्व अनित्य-नित्य, गुरु-लघु है एक-अनेकस्वरूप ।
यह सत्-असत् स्वरूप तथा है, पूर्ण-शून्य अति गहनस्वरूप॥
श्रुताभ्यास से ज्ञान ज्योतिमय, वस्तु-विचार-प्रवीण सुजान ।
नर भी शंकित हो जाते हैं, जयवन्तो वह तत्त्व महान॥
अन्वयार्थ : जो चैतन्यरूपी आत्मतत्त्व, नित्य-अनित्य, गुरु-लघु, एक-अनेकरूप तथा सत्-असत्रूपपने से अत्यन्त गहन है । जो पूर्ण तथा शून्य भी है - ऐसा यह आत्मतत्त्व, इस लोक में सदा जयवन्त है । जिस आत्मतत्त्व के सम्बन्ध में, समस्त शास्त्रों के अभ्यास से पायी हुई ज्ञान की प्रभा से दैदीप्यमान तथा वास्तविक पदार्थों का विचार करने में चतुर मनुष्य भी मुग्ध हो जाता है अर्थात् उसको भी इस चैतन्यतत्त्व का पता नहीं लग पाता ।