+ आत्मारूपी हंस और मोक्षरूपी हंसिनी -
सर्वस्मिन्नणिमादि-पंकज-वने, रम्येऽपि हित्वा रतिं;
यो दृष्टिं शुचि-मुक्ति-हंस-वनितां, प्रत्यादराद्दत्तवान् ।
चेतो-वृत्ति-निरोध-लब्ध-परम,-ब्रह्म-प्रमोदाऽम्बुभृत्;
सम्यक्-साम्य-सरोवर-स्थितिजुषे, हंसाय तस्मै नम: ॥3॥
अणिमादिक सब ऋद्धि विभूषित, सुन्दर पंकजवन से प्रीति ।
तज कर निर्मल मुक्ति-हंसिनी, में जिसकी आदरमय दृष्टि॥
चित्तवृत्ति का कर निरोध, पाया जो परम ब्रह्म आनन्द ।
जल से भरे सरोवर में, जो रमे हंस उसको वन्दन॥
अन्वयार्थ : जो हंस अर्थात् आत्मा, अत्यन्त मनोहर अणिमा आदि महिमा वाले कमलवन से अपनी प्रीति को हटा कर, अत्यन्त पवित्र मोक्षरूपी हंसिनी में अपनी दृष्टि को लगाता है; वह अपनी चित्तवृत्ति को रोक कर, परब्रह्म के आनन्द से युक्त उत्तम जल से पूर्ण, अत्यन्त मनोहर समतारूपी सरोवर में स्थित है, उस हंस के लिए हमारा नमस्कार है ।