+ चैतन्यरूपी तेज की प्रगटता एवं कल्याणमयता -
(रथोद्धता)
सर्व-भाव-विलये विभाति यत्,
सत्समाधि-भर-निर्भरात्मन: ।
चित्स्वरूपमभित: प्रकाशकं,
शर्म-धाम नमताऽद्भुतं मह: ॥4॥
सर्व विभाव-विलीन समाधि-स्वरूप महामुनि को प्रत्यक्ष ।
पूर्ण प्रकाश स्वरूप तेज यह, अद्भुत चिन्मय को वन्दन॥
अन्वयार्थ : चारों तरफ से प्रकाशरूप, नाना प्रकार के कल्याणों को देने वाला आश्चर्यकारी चैतन्य तेज, 'समीचीन समाधि से जिनकी आत्मा व्याप्त है' - ऐसे महामुनियों के समस्त राग-द्वेषादि विभावों का नाश होने पर प्रगट होता है, उस चैतन्यरूपी तेज को नमस्कार है ।